तेरे आने की जब खबर महके
तेरी खुशबू से सारा घर महके
शाम महके तेरे तस्वुर से
शाम के बाद फ़िर सहर महके
रात भर सोचता रहा तुझको
जहनों दिल मेरे रात भर महके
याद आए तो दिल मुरबर हो
दीद हो जाए तो नज़र महके
वो घड़ी दो घड़ी जहाँ बैठे
वह जमीन महके वह शजर महके [जगजीत सिंह की गायी एक और खूबसूरत गजल ]
अभी तो आई है मेरे दर पर ख़ुशी कही यह तेरी तेज़ रफ़्तार से डर ना जाए!! - रंजू
Sunday, May 25, 2008
तेरे आने की जब खबर महके
Saturday, May 24, 2008
जरा यूं भी सोचिये ...
अमित जी आपकी पोस्ट के जवाब में मैं यही कह सकती हूँ ..
बच्चे घर मे दोनों के प्यार के लिए तरसते रह जातें हैं । नई पीढ़ी माँ बाप के प्रेम से वंचित है। आरुषी का केस इसलिए (खास तौर से समूची नारी जाति के लिए एक आई ओपनर है। यही घड़ी है नारी समाज अब समाज राष्ट्र भावी पीढ़ी के हित में घरो की ओर अपना रुख कर ले।
http://ultateer.blogspot.com/
सवाल कई है और जवाब भी कई ...? पर क्या यह सचमुच इतना आसान है ...परिवार टूटने लगे हैं बिखरने लगे हैं ..? और एक महिला घर पर रहे .क्या आपको लगता है की इस से समस्या सुलझ जायेगी ..."?महिला कभी कोई भी काम करे अपने परिवार को भूल नही पाती है ...पर जो हालत आज कल पैदा हो रहे हैं उस में उसका नौकरी करना भी उतना ही जरुरी है जितना परिवार को वक्त देना .और ना सिर्फ़ वक्त बेवक्त की मुसीबत के लिए उसके अपने लिए भी अपने पेरों पर खड़ा होना सवालंबी होना जरुरी है यही वक्त की मांग है ....पर इस में सबका सहयोग चाहिए ...बढ़ती महंगाई , बदलता समाज हमारे रहने सहने का ढंग सब इतने ऊँचे होते जा रहे हैं कि एक की कमाई से घर नहीं चलता है .. और यह सब सुख सुविधाये अपने साथ साथ बच्चो के लिए भी है ..बात महिला के घर पर रहने की या न रहने की नही है असल में बात है माता पिता दोनों को वक्त देने की अपने बच्चो को अपने बच्चो से निरन्तर बात करने की ..और उन को यह बताने की हम हर पल आपके साथ है ..आप क्या समझते हैं जिन घरों में महिलाए रहती है वहाँ बच्चे नही बिगड़ते हैं ..??आज का माहोल जिम्मेवार है इस के लिए ..अपने आस पास नज़र डालें जरा ..दिन भर चलता टीवी उस पर चलते बेसिरपैर के सीरियल अधनंगे कपड़ो के नाच ,माल संस्कृति ,और लगातार बढ़ती हिंसा .. जिन्हें आज कल बच्चे दिन रात देखते हैं इंटरनेट का बढता दुरूपयोग ...मोबाइल का बच्चे बच्चे के हाथ में होना ..क्या आप रोक पायेंगे या एक माँ घर पर रहेगी तो क्या यह सब रुक जायेगा ..नही ..यह आज के वक्त की मांग है और माता पिता यह सुविधा ख़ुद ही बच्चो को जुटा के देते हैं .ताकि उनका बच्चा किसी से ख़ुद को कम महसूस न करे और यही सब उनके दिमाग में बचपन से बैठता जाता है और तो और उनके कार्टून चेनल तक इस से इस से बच नही पाये हैं ..अब घर पर माँ है तब भी बच्चे टीवी देखेंगे और नही है तब भी देखेंगे ..इन में बढती हिंसा और हमारा इस पर लगातार पड़ता असर इन सब बातो को बढावा दे रहा है ..नेतिकता का पतन उतनी ही तेजी से हो रहा है जितनी तेजी से हम तरक्की की सीढियाँ चढ़ रहे हैं ..हर कोई अब सिर्फ़ अपने बारे में सोचता है...और जब उस राह पर मिलने वाली खुशी में कोई भी रोड अटकाता है तो बस उसको मिटाना है हटाना है अपने रास्ते से यही दिमाग में रहता है ....संस्कार माँ बाप दोनों मिल कर बच्चे को देते हैं ..शिक्षा का मध्याम ज्ञान को बढाता है और यही नए रास्ते भी सुझाता है .. पर जीवन के इस अंधाधुंध बढ़ते कदमों में जरुरत है सही दिशा की सही संस्कारों की ...और सही नेतिक मूल्यों को बताने की ...सिर्फ़ माँ की जिम्मेवारी कह कर पुरूष अपनी जिम्मेवारी से मुक्त नही हो सकता वह भी घर की हर बात के लिए हर माहोल के उतना ही जिम्मेवार है जितना घर की स्त्री ..यदि वह अपना आचरण सही नही रख पाता है तो एक औरत माँ कितना संभाल लेगी बच्चे को आखिर वह सब देखता है अपने जीवन का पहला पाठ वह घर से ही सिखाता है हर अच्छे बुरे की पहचान पहले उसको अपने माँ बाप दोनों के आचरण से होती है वही उसके जीवन के पहले मॉडल रोल होते हैं ...मैं तो यही कहूँगी कि आज के बदलते हालात का मुकाबला माता पिता दोनों को करना है और अपने बच्चो को देने हैं उचित सही संस्कार ..बबूल का पेड़ बो कर आम की आशा करना व्यर्थ है ..और नारी को सिर्फ़ घर पर बिठा कर आप इन बिगड़ते हालात को नही सुधार सकते ..यह हालात हम लोगो के ख़ुद के ही बनाए हुए हैं तो अब इनका मुकाबला भी मिल के ही करना होगा ..नही तो यूं ही अरुशी केस होते रहेंगे और इंसानियत शर्मसार होती रहेगी ...आप इसको जरा यूं भी सोचिये ..
Friday, May 23, 2008
शहतूत की डाल पर बैठी मीना ...
मीना कुमारी में एक सबसे अच्छी बात यह थी कि वह बहुत अच्छी इंसान थी तो सबसे बुरी बात यह थी कि वह बहुत जल्दी सब पर यकीन कर लेतीं थी और वही इंसान उन्हें धोखा दे के चला जाता था ..गुलजार जी ने मीना जी की भावनाओं की पूरी इज्जत की उन्होंने उनकी नज्म ,गजल ,कविता और शेर को एक किताब का रूप दिया जिस में उन्होंने लिखा है
शहतूत की डाल पर बैठी मीना
बुनती रेशम के धागे
लम्हा लम्हा खोल रही है
पत्ता पत्ता बीन रही है
एक एक साँस बजा कर सुनती है सोदायन
अपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही धागों की कैदी
रेशम की यह कैदी शायद
एक दिन अपने ही धागों में घुट कर मर जायेगी !
इसको सुन कर मीना जी का दर्द आंखो से छलक उठा उनकी गहरी हँसी ने उनकी हकीकत बयान कर दी और कहा जानते हो न वह धागे क्या हैं ? उन्हें प्यार कहते हैं मुझे तो प्यार से प्यार है ..प्यार के एहसास से प्यार है ..प्यार के नाम से प्यार है इतना प्यार कोई अपने तन पर लिपटा सके तो और क्या चाहिए...
मीना जी की आदत थी रोज़ हर वक्त जब भी खाली होती डायरी लिखने की ..वह छोटी छोटी सी पाकेट डायरी अपने पर्स में रखती थी ,,गुलजार जी ने एक बार पूछा उनसे कि यह हर वक्त क्या लिखती रहती हो ..तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं कोई अपनी आत्मकथा तो लिख नही रही हूँ बस कोई लम्हा दिल को छु जाता है तो उसको इस में लिख लेती हूँ कोई बात जहन में आ जाती है तो उसको इस में कह देती हूँ बाद में सोच के लिखा तो उस में बनावट आ जायेगी जो जैसा महसूस किया है उसको उसी वक्त लिखना ज्यादा अच्छा लगता है मुझे ...और वही डायरियाँ नज़मे ,गजले वह विरासत में अपनी वसीयत में गुलजार को दे गई जिस में से उनकी गजले किताब के रूप में आ चुकी हैऔर अभी डायरी आना बाकी है गुलजार जी कहते हैं पता नही उसने मुझे ही क्यों चुना इस के लिए वह कहती थी कि जो सेल्फ एक्सप्रेशन अभिवय्कती हर लिखने वाला राइटर शायर या कोई कलाकार तलाश करता है वह तलाश उन्हें भी थी शायद वह कहती थी कि जो में यह सब एक्टिंग करती हूँ वह ख्याल किसी और का है स्क्रिप्ट किसी और कि और डायरेक्शन किसी और कहा कि इस में मेरा अपना जन्म हुआ कुछ भी नही मेरा जन्म वही है जो इन डायरी में लिखा हुआ है ...
किंतु उन में अपनी जिंदगी जीने का एक अनूठा साहस था ,अभिनय के समय वह अपने दर्द पर काबू पा लिया करती थी और हर मिलने वाले से बहुत मुस्करा के मिला करती थी ..इसी दर्द को सहने की शक्ति ने उनसे कहलवाया था ..
हँस हँस के जवां दिल के हम क्यों न चुने टुकडे
हर शख्स की किस्मत में इनाम नही होता ...
सही में कई की किस्मत में दर्द के सिवा कुछ नही होता ..उनकी कुछ यादो को यहाँ इस तरह याद किया गया
मीना कुमारी के बारे में कमाल अमरोही बताते हैं कि बासी रोटी बहुत पसंद थी जब एक दिन नौकर रात को रखना भूल गया तो उन्होंने बच्चो की तरह रोना शुरू कर दिया वह कहते हैं कि वह कान की बहुत कच्ची थी वह लोगों के बहकावे में बहुत आसानी से आ जाती थी ..जब वह बच्ची थी तो बताती है कि उन्हें भी और बच्चों कि तरह कहानी सुनने में बहुत मज़ा आता था वह सब बहने मिल कर अम्मा या दादी को कहानी सुनाने के लिए मनाया करती थी ...और कई तरह की कहानी सुना करती थी .परियों की राजा की दूर देश की ..हर किस्म के किस्से और कहानियाँ बहुत मज़ा आता था तब ..अब तो हँसे हुए भी ज़माना हो गया वह यह बात कह के चुप हो गई थी ..
एक बार उनसे किसी ने पूछा कि उन्हें क्या पसंद है तो उन्होंने हँस के कहा कि मुझे मौत पसंद है ...क्यों?पूछने वाले ने हैरानी से पूछा तो उन्होंने कहा इसका जवाब तो शायद किसी किताब में न मिले यह अपनी निंजी पसंद है..मैं इस शब्द में एक शान्ति अमन और आराम महसूस करती हूँ जिसकी चुप्पी हर बीतते लम्हे में एक दिलचस्प कहानी सुनाया करती है ..मुझे भीड़ अच्छी नही लगती ..मुझे लड़ाई झगडा अच्छा नही लगता बस अपने में रहना अच्छा लगता है ..तब अपने ही दिल की कहानी होती है और उस कहानी को सिर्फ़ आप ही सुन सकते हैं ..शोर शराबे और झगडों में में बेहद खालीपन है एक शायर ने बिल्कुल ठीक कहा है ..
मौत ..तूफ़ान की एक उभरती लहर
ज़िंदगी ...एक हवा का झन्नाटा अश्क...
वीरान ..कहकशां का शहर
कहकहा ...एक उदास सन्नाटा
शेष अगले अंक में
Thursday, May 22, 2008
क्या आज का सिनेमा टीवी हमे सिर्फ़ यांत्रिक मानव बना रहा है ?
आज का युग केबल युग है ..दिन की शुरुआत होती है टीवी को आन करने से और फ़िर दिमाग पर छाने लगता है जादू रुपहले परदे का ..कभी यह चैनल कभी वह चैनल कहीं नाचते सितारे कहीं हत्या और कहीं एक्सीडेंट .इन सब के बीच में हर ख़बर चैनल पर भविष्य बताता हुआ कोई बाबानुमा व्यक्ति ...अखबार के विज्ञापन से शुरू हुई अभिनेता और अभिनेत्री को देखने की यात्रा रात को किसी घटिया पिक्चर या बेहूदे से किसी सीरियल की कहानी पर खत्म होती है ..पहले फ़िल्म देखते थे तो लगता था जैसे कुछ अपने अन्दर समेट के ले आए हैं ..अब सिनेमा हाल में जाते ही बत्ती गुल होते ही दिमाग की बत्ती भी गुल हो जाती है ..जैसे दिमाग तीन घंटे तक किसी समाधि में चला जाता है और पिक्चर खत्म होते ही शुरू हो जाता है दिमाग में बिम्बों और छवि का छाना..पहले हम सिनेमा देखते थे अब सिनेमा हमे देखता है क्यूंकि इस आने वाली अब तस्वीरे इतनी आक्रामक और उतेजित होती हैं जो हमारी कल्पना की दुनिया से हमे कहीं दूर ले जाती हैं ......आज कल बनने वाली फिल्मों में कुछ एक आध फिल्म ही दिल को छू पाती है पर अधिकतर तो पता नही कब आई कब गई की तर्ज़ पर ही बन रही हैं .पहले सिनेमा में सिर्फ़ दो ही सिथ्ती होती थी एक गांव और एक शहर की संस्कृति अब यह जो सिनेमा की छवि है वह सिर्फ़ सिनेमाई संस्कृति है जो हमे सच की दुनिया से दूर लेती जा रही है .हमारे दिलोदिमाग को टीवी और सिनेमा के इन दृश्यों ने इतना कब्जा कर लिया है कि अब हमारे दिमाग दिल में कल्पना के लिए जैसे कोई जगह ही नही बची है दिमाग में हमारे ..यदि कोई कुदरत का नज़ारा कुछ देर के दिल को किसी कल्पना तक ले भी जाना चाहता है तो उसी वक्त कोई अजब सी पोशाके पहने इस तरह का गाना शुरू हो जाता है कि हमारा ध्यान उस कुदरत के नजारे से निकल कर उन्ही की अदाओं और पोशाकों में उलझ के रह जाता है, जिस में रह जाता है सिर्फ़ शब्दों का नकली दिखावा बड़े भव्य सेट्स झिलमिलाती अधनंगी सी पौशाके जिनको हम तो देख ही रहे हैं पर उस पर त्रासदी यह है की आने वाली भावी पीढ़ी को भी हम कुछ दे नही पा रहे हैं इन के द्वारा अब चाहे वह सिनेमा हो या केबल से जुडा घर का टीवी बक्सा ....क्यों आखिर हो रहा है ऐसा ? क्यूंकि यह सब हमारे जीवन की किसी भावात्मक और कलात्मक सोच को नही बताते बलिक यह सिर्फ़ कुछ पल के लिए एक उतेजना देते हैं जो हमारी किसी सोच को कल्पना नही दे पाते हैं ..यदि यही हाल रहा तो भविष्य में सिर्फ़ फेंत्सी ही ज़िंदगी बन के रह जायेगी और हम टीवी या सिनेमा नही देखेंगे यह हम पर इतना इस कदर हावी हो जायेंगे की हम कल्पना अपनी सोच सब भूल के सिर्फ़ एक यांत्रिक मानव बन के रह जायेंगे ..
Wednesday, May 21, 2008
मौसम को इशारों से बुला क्यों नही लेते...
मौसम को इशारों से बुला क्यों नहीं लेते
रूठा है अगर वो तो मना क्यों नहीं लेते
दीवाना तुम्हारा कोई गैर नहीं
मचला भी तो सीने से लगा क्यों नही लेते
ख़त लिखकर कभी और कभी ख़त को जलाकर
तन्हाई को रंगीन बना क्यों नही लेते
तुम जाग रहे हो मुझको अच्छा नही लगता
चुपके से मेरी नींद चुरा क्यों नही लेते
मौसम को इशारों से बुला क्यों नही लेते [जगजीत सिंह .]..दिल्ली का मौसम तो वैसे ही सावन आया भूल के हो गया है ..इस मौसम में यह दो गाने अच्छे लगे आप भी सुने :)
मैनू तेरा शाबाब ले बैठा .. [जगजीत सिंह .].
Tuesday, May 20, 2008
कैलाश मानसरोवर

कैलाश मानसरोवर की यात्रा इस साल एक जून से शुरू हो रही थी पर अभी अभी सुना की यह रोक दी गई है चीन के द्वारा बिना कारण बताये कोई वजह नही बताई है इस फैसले की ..पहला जत्था १ जून को दूसरा ४ जून को और तीसरा इसके १ हफ्ते के बाद जाना था हर जत्थे में सहायकों और कर्मचारी समेत करीब १०० लोग होते हैं ..पहले दो जत्थों को रोक दिया गया है और यह कहा गया है कि तीसरा जत्था अपने समय से जायेगा अब यह तिब्बत समस्या की वजह से हुआ है यह तो चीन वाले अधिकारी ही बता सकते हैं ...
भम भोले के इस स्वर्गलोक को देखने की इच्छा किस के दिल में जागृत नही होती है पर यह इतना आसान नही है बहुत ही मुश्किल यात्रा है यह हिमालय पार जाना कोई आसान बात भी तो नही है मैं तो वहाँ जाने वाले यात्रियों के अनुभव पढ़ती जाती हूँ और जो निश्चय दिल में जागता है कि एक बार तो यहाँ जरुर जाना है उस रास्ते की मुश्किलें देख कर जैसे सब एक पल में दिल डगमगा जाता है यह यात्रा तिब्बत में कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील की परिक्रमा करने से पूरी होती है ..यह यात्रा बहुत ही मुश्किल मानी जाती है इस में १९ हज़ार ५०० फुट की ऊंचाई तक की यात्रा करनी पड़ती है पहले लिखी किताबों और लेखो में जो पढने में आया है कि यहाँ तिब्बती डाकू का बहुत डर हुआ करता था पर इसके साथ ही जब इसके भौतिक गुणों को पढ़ा तो इसके बारे में पढ़ें तो उत्सुकता और बढती गई
.... तिब्बत में चीनी घुसपेठियों के बाद १९४८ में यह स्थान भारतीय यात्रियों के लिए और व्यापारियों के लिये बंद कर दिया गया था बाद में १९ ८१ में इसको फ़िर से चीन की सरकार ने यह खोल दिया ..यह वह स्थान है जो हर हिंदू व एशिया में रहने वाले के दिल में धड़कता है कुदरत में अपना विश्वास मनुष्य ने बहुत पहले ही तलाश करना शुरू कर दिया था और इस परिकर्मा में तो छिपी है जीवन से मुक्ति की भावना और आज का मनुष्य भी इस से मुक्त नही हो पाया है
कई तरह कीजांच पड़ताल आवेदन शरीर की स्वस्थता और फ़िर उसके बाद चयन करने कि मुश्किल पार करने के बाद कई हजारों में से कुछ को जाने कि अनुमति मिलती है वहाँ या यह कहो जिस पर भोले बाबा की कृपा रहे वही इस यात्रा को सम्पूर्ण कर पाता है ...इस यात्रा को महज एक धार्मिक यात्रा समझाना कहना कम होगा क्यूंकि यह तो यात्रा है समाज संस्कृति वहाँ की प्राकतिक परिस्थति और आज के तिब्बत को जानने की और हिमालय के उस पर जहाँ भोले बाबा का निवास है उसको देखने की .....मानसरोवर झील में बिखरे वहाँ के कुदरती नज़ारों को निहारने की ...यहाँ पर खड़े शुभ्र शिखरों से मिलना तिब्बत के बौद्धिक मठो को देखना याक और कई तरह घुमंतू पशुचारकों से मिलना और कई जगह से आए तीर्थ यात्रीओं के साथ समय बिताना सच में एक नया अनुभव होगा जो शायद कभी नही भूल सकता है ..यह यात्रा अल्मोड़ा से धारचूला.तवा घाट ,मांगती ,गाला ,बुदधी ,गुंजी ,कालापानी और नवीधांग से लिपू दर्रा होते हुए चीन की सीमा में प्रवेश करती है चीन के इलाके में चीनी सुरक्षा के घेरे में यात्री आगे बढ़ते हैं ...कैलाश पर्वत की परिकर्मा करने के लिए यात्रियों को ५५ किलोमीटर चलना पड़ता है
पढ़ के लिख के जाने की इच्छा बलवती हो उठती है .पर जायेगा तो वही न जिसका बुलावा आएगा .और यह राजनितिक समस्याए खत्म होंगी .मानसरोवर झील को देखने का सपना हर भारतीय के दिल में रहता है भम भम भोले का दर्शन पाना इतना सरल भी तो नही .भम भम भोले की जय ..:)
Sunday, May 18, 2008
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे ,मैं एक शाम चुरा लू अगर बुरा न लगे
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे ,मैं एक शाम चुरा लू अगर बुरा न लगे
मुन्नी बेगम का गाया यह गाना बेहद खूबसूरत लगता है मुझे ..आपको कैसा लगा ..बताये सुन के ..क्या आपका दिल चुराया इस गाने ने :)
Friday, May 16, 2008
मचलते हुए दिल की धड़कन न सुलझे....

साहित्यक मीना कुमारी की माँ इकबाल एक उर्दू साहित्यिक परिवार की बेटी थीं उर्दू साहित्य में उन्हें रूचि थी उनेक पिता जनाब शाकिर मेरठी अपने वक्त के ख्याति प्रपात कहानी कार शायर और साहित्यकार थे बच्चो के लिए वह अपने अंदाज़ में विशेष रूप से कहानी लिखा करते थे ..मीना जी के पिता जी मास्टर अलीबक्श स्टेज पर हारमोनियम बजाय करते थे ...काम कम मिलता था मीना की पहली फ़िल्म की आय से घर चलाना शुरू हुआ उनका बचपन खेल खिलोने में नही स्टूडियो के आर्क लेम्पों और बड़े बड़े पंखों के शोर में गुजरा ... कई साल तक बाल कलाकार के रूप में काम किया रुपया भी कमाया और एक बंगला भी खरीदा वह उनकी माँ इकबाल के नाम ही रखा गया
इस तरह मीना कुमारी की फिल्मी यात्रा आगे बदती गई कई लोग सामने आए कुछ पल साथ चले तमाम नामी निर्देशकों के साथ काम करने का अवसर मिला इन्हे निर्माता निर्देशक केदार शर्मा के साथ फ़िल्म चित्रलेखा में काम किया उनका काम लेने का ढंग अपना ही था वह बहुत प्यार से सभी कल्कारों को संवाद और दृश्य समझाया करते थे और जब वह किसी के काम से खुश हो जाते थे तो इनाम के फलस्वरूप उसको एक दुअन्नी देते थे बाद में उन्होंने इसको चवन्नी कर दिया एक बार इसी फ़िल्म की शुटिंग के दौरान मीना ने कहा कि अब तो आपके पास बहुत सी चवन्नी दुअन्नी हो गई है अब तो रेट बड़ा दीजिये और उन्होंने मीना जी के दृश्य के अभिनय से खुश हो कर उन्हें १०० रूपए दिए थे एक बार एक फ़िल्म काजल में एक डायालग लिखा था ॥औरत और धरती एक समान होते हैं मानों कितना कुछ अपने सीने में दबा के रखते हैं यही डायालग जब केदार शर्मा जी ने मीना जी के सामने दोहराया तो मीना ने चिढ कर कहा आप बार बार यह कहते हैं कि औरत और धरती एक समान हैं लेकिन मैं कहती हूँ कि यह बात बिल्कुल ग़लत है औरत सहनशील होती है हर अत्याचार अन्याय को सहन कर लेती है जबकि धरती कभी सहनशील नही रहती है उस में भूकम्प आते हैं तूफ़ान आते हैं वह हर अत्याचार का बदला लेती है लेकिन औरत कहाँ लेती है उसको लेना चाहिए उसको अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ़ बोलना चाहिए ,,सुन के सब वही चुप हो गए
अपनी फ़िल्म फ़र्ज़न्द ऐ वतन से लेकर मीनाकुमारी की आखरी फ़िल्म गोमती के किनारे तक मीना कुमारी का अपना वय्क्तितव अपना चरित्र साथ चलते रहे मानो मीना हर चरित्र में ख़ुद को जीती रहीं और उन्हें इसके लिए कई इनाम पुरस्कार भी मिले
मीना कुमारी यदि एक मशहुर अभिनेत्री होती तो शायद उनके बारे में कुछ यादो को समेटा जा सकता है .पर इसके साथ ही वह एक बेहद भावुक शायरा भी थी उन्होंने न ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई को जीया बलिक एक सच्चाई बन गई जिन पर कई किताबे लिखी गई और हर साल उनकी पुण्य तिथि पर उन्हें याद किया जाता है उनके लिखे से भी ...उनकी एक रचना ..
मेरी तरह कोई न हो ..
अल्लाह करे कि कोई भी मेरी तरह न हो
अल्लाह करे कि रूह की कोई सतह न हो
टूटे हुए हाथों से कोई भीख न मांगे
जो फ़र्ज़ था वह क़र्ज़ है पर इस तरह वह भी न हो .....
उलझे
मचलते हुए दिल की धड़कन न सुलझे
जो काजल से छूटे तो आँचल से उलझे
ग़मगीन आंखों से पोंछों शिकायत
कहो बूंद से यूं न बादल से उलझे
तंग आ गए हैं दिल की एक एक जिद से
खुदा की पनाह कैसे पागल से उलझे
****मीना कुमारी की कलम से ..
शेष बहुत बाकी है दास्तान उस महजबीं की जिसको पढ़ते लिखते न जाने कितने लफ़ज़ दिल में मचल उठते हैं
© 2006-08 सर्वाधिकार सुरक्षित! सम्पर्क करें- ranjanabhatia20

