Monday, January 04, 2010

एहसास (कुछ यूँ ही )



सर्दी का ...
घना
कोहरा..
उसमें..
डूबा हुआ मन..
एक अनदेखी सी
चादर में लिपटा हुआ
और तेरी याद उस में
आहिस्ता से ,धीरे से
उस कोहरे को चीरती
यूँ मन पर छा रही है
जैसे कोई कंवल
खिलने लगा है धीरे धीरे
और आँखों में
एक चाँद...
मुस्कराने लगा है ...

रंजना (रंजू )भाटिया


"सन्डे विदआउट सन शाइन "..इंडिया गेट का नजारा ३ जनवरी २०१० को मेरे कैमरे की नजर से ..दिल्ली की सर्दी ....

रंजना (रंजू )भाटिया
३ जनवरी २०१०

Thursday, December 31, 2009

झूमता हुआ नया साल फ़िर आया....


नया साल
एक नई आशा
नई उम्मीद जगाता हुआ
कलेंडर के पन्नों पर
उतर आता है
और कुछ दिन तो
अपने नयेपन के एहसास से
कुछ तो अलग रंग दिखाता है....

फिर ढलने लगते हैं लम्हे
वक़्त यूँ ही गुजरता जाता है ....
कुछ नया होने की आस में
यह जीवन यूँ ही बीतता जाता है

नए साल की सबको बहुत बहुत बधाई ......इस नए साल की शुरू आत इस बार एक बाल पत्रिका में पब्लिश हुई बाल कविता से ...आने वाला नया साल यूँ ही किसी बच्चे सा मासूम हो ,सबके लिए मंगलमय हो ..इसी दुआ के साथ ...

झूमता हुआ फ़िर से नया साल आया
खुशियों की नई सौगात यह लाया


बीते पल को दे अब हम विदाई
नए पलों को यह दिखाने को लाया
झूमता हुआ नया साल फ़िर आया


सब तरफ़ अब हटे
अन्धकार का अँधेरा
बिखरें किरणे दिनकर की
नया हो सवेरा ..
कुदरत ने भी गीत नया गया
झूमता हुआ नया साल फ़िर से आया

नव बीज से नया भारत हम बनाएं
जाति धर्म का हर भेद मिटायें
मानव धर्म को सब अपनाएँ
यही संदेश दिल ने फिर दोहराया
झूमता हुआ नया साल फ़िर से आया

रंजना (रंजू ) भाटिया

 
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